द्वारका पूरी, द्वारकाधीश मंदिर | Dwarkadhish Temple -Gujrat
द्वारका एक प्राचीन नगरी है, यह गुजरात के सौराष्ट्र में गल्फ ऑफ़ खम्भात सागर (अरब सागर) के पास है जो बसी है गोमती नदी और अरब सागर के संगम पर। यहां पूजे जाते हैं विष्णु के अवतार श्री कृष्ण, और जिन्हे हम प्यार से बुलाते हैं द्वारकाधीश। द्वारकाधीश मंदिर को जगत मदिर और त्रिलोक सुन्दर के नाम से भी जाना जाता है। द्वारका को तो ग्रंथों में मोक्ष का द्वार भी माना गया है। चार धामों में से एक, भारत के पश्चिम में समुन्द्र के किनारे पर बसी द्वारकाधीश मंदिर जगत मंदिर या निज मंदिर के रूप में भी जाना जाता है।
द्वारका नगरी का इतिहास
कंस के ससुर जरासंध के मथुरा पर बार बार आक्रमण करने के कारण श्री कृष्ण सारी प्रजा को लेकर सौराष्ट्र आ गए। ऐसा कहतें हैं की द्वारका को बसने के लिए श्री कृष्ण ने समुद्र देव से जमीन ली, और देवताओं के शिल्पकार
विश्वकर्मा से रातों रात इस नगरी का निर्माण करवाया। विशाल दीवारों से घिरी ये सोने की नगरी वास्तुकला की बेहतरीन मिशाल थी।
ऐसा कहा जाता है की मूल द्वारका नगरी समुन्द्र में विलीन हो गया और इसके अवशेष आज भी समुन्द्र की गहराइयों में है। आज भी बैज्ञानिक इसका खोज करने के लिए समुन्द्र में गोता लगते हैं। समुन्द्र के अंदर से बहुत से अवशेष
मिले है जो उसी समय काल के हैं।
द्वारका का रहस्य और पुरातत्त्व खोज बीन
समुन्द्र में द्वारका नगरी के सदियों पुराने रहस्य छुपे हैं, बहुत से पुरातत्त्व विशेषज्ञ यहाँ समय समय पर अपनी खोज बीन करते रहते हैं। विशेषज्ञों को उस समय काल के बहुत सारे साक्ष्य मिले है जो उस समय के बिबरन से मिलते हैं।
पुरातत्त्व विशेषज्ञ उनकी टीम ने तटवर्ती और समुन्द्र के अंदर खोज बीन की शुरुआत की। इनके उत्खनन और समुद्री खोजो में पुरानी इमारतों के अवशेष, गहने, बर्तन के टुकड़े और मुहरे मिली। पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण ने भी अपने सभी नागरिकों को मुहरे दी थी। खोज बीन में मिले बस्तुओं का समय काल भी वही है जो पुराणों में बताया गया है। इसके अलावा द्वारका से करीब 33 किलोमीटर दूर बेट द्वारका के पास एक द्वीप पर 560 मीटर लम्बी एक दीवार मिली है जिसकी बनावट महाभारत के बिबरन से मिलती है। महाभारत के हिसाब से दीवारों में 50 बुर्ज था। पुरातत्त्व को इसमें से करीब 30 बुर्ज मिल चुके थे।
द्वारकाधीश का मंदिर किसने बनवाया?
द्वारकाधीश मंदिर को 400 ईसा पूर्व में, भगवान कृष्ण के महान पोते वज्रनाभ द्वारा बनाया गया था। इस मंदिर ने हज़ारो सालो में कई आक्रमण और कई पुनरनिर्माण तथा विस्तार देखे हैं। इस नगरी ने बहुत सारे शाशको को देखा है, गुप्त वंस से लेकर राजपूत, मराठा, मुगलों और अंग्रेजो तक। 8 वी सदी के महान बिद्वान अदि गुरु शंकराचार्य ने इसका पुनर निर्माण करवाया , इसके बाद इसकी देख रेख राजपूतों ने की। 15 वी सताब्दी में मेहमूद बेगड़ा ने इसे तोड़ दिया। 1857 में अंग्रेजो ने इसे बहुत क्षति पहुंचाया। लेकिन 1861 में अंग्रेजो ने गायकवाड़ों के साथ इसकी मरम्मत भी करवाई। 1960 में इस मंदिर को द्वारकाधीश टेम्पल एडमिनिस्ट्रेटिव कमिटी को सौंप दिया गया।
मंदिर का वास्तुकला
गोमती नदी के तट पर स्थित 170 फीट की ऊंचाई तक फैला है, पांच मंजिला चूना पत्थर की संरचना वाला यह मंदिर 72 स्तंभों पर खड़ा है। ग्रेनाइट और सैंड स्टोन से बना ये मंदिर नागरा वास्तुकला शैली का बेजोड़ उदहारण है। इस मंन्दिर में 5 मंजिल हैं और 72 स्तम्ब हैं। मंदिर के दीवारों पे बहुत सारे देवी देवताओं और पशु पक्षियों की कला कृतियां बानी हैं। इस मंदिर में प्रवेश के दो द्वार हैं - मोक्ष द्वार और स्वर्ग द्वार। स्वर्ग द्वार तक आने के लिए 56 सीढिया हैं।
द्वारकाधीश की प्रतिमा की कहानी
द्वारकाधीश की प्रतिमा की आँखें अधूरी बनी है। ऐसा माना जाता है की ये प्रतिमा सावित्री बाव नाम के एक कुंवे में मिली थी। 15 वी शताब्दी में मुस्लिम आक्रमणकारियों के डर से मंदिर के पुजारियों ने इसे
कुंवे में छुपा दिया था। ऐसा कहते हैं की कई सालों बाद श्री कृष्ण एक ब्राह्मण के सपने में आये और मूर्ति को निश्चित समय के बाद कुंवे से निकलने का निर्देश दिया। ये सपना देखने के बाद वो ब्राह्मण बेताब हो गया और
उसे रहा नहीं गय। उस ब्राह्मण ने निर्धारित समय से पहले ही उस मूर्ति को कुंवे से निकल दिया, इसलिए इस प्रतिमा की आँखें पूरी तरीके से बन नहीं पायीं। मंदिर में तबसे यही चार भुजाओ वाली मूर्ति स्थापित और बिराजमान है।
मंदिर का खुलने और पूजा का समय
द्वारकाधीश मंदिर में त्योहारों के अलावा बहुत भीड़ नहीं होती है, औसतन दस हज़ार लोग रोज़ दर्शन करने आते हैं। ये संख्या जन्मास्टमी के समय बढ़कर डेढ़ लाख तक पहुंच जाता है। दोपहर में आरती के समय मुख्य द्वार बहुत
सारे श्रद्धालु इकट्ठा होते हैं और कभी-कभी भीड़ होती है, लेकिन फिर भी आप दूसरों से सुरक्षित दूरी बनाए रखते हुए अच्छे से दर्शन कर सकते है। आप एक से दो घंटे में अच्छे से दर्शन कर सकते हैं।
हर रोज़ द्वारकाधीश को 11 बार भोग लगाया जाता है तथा चार बार उनकी आरती होती है। जन्मास्टमी के दिन तो 50 से भी ज्यादा भोग बनता है, जिसे महाभोग कहते हैं। सुबह 6:30 बजे मंगला आरती से द्वारकाधीश को जगाया
जाता है। फिर सुबह 10:30 बजे श्रृंगार आरती में सजाया जाता है। भोग लगाने के बाद दोपहर 1 बजे द्वारकाधीश का विश्राम का समय होता है। 1 बजे से लेकर 5 बजे तक मंदिर बंद रहता है। ये समय द्वारकाधीश के विश्राम का है।
शाम को 7:30 बजे संध्या आरती होती है, और रात में 8:30 बजे सयन आरती के बाद सुलाया जाता है। द्वारका की गलियों में हर जगह तुलसी माला मिलती है।
श्री कृष्ण की पूजा में तुलसी का बड़ा ही महत्व है। ऐसा माना जाता है की तुलसी कृष्ण की पत्नी होने के साथ साथ प्रेम की प्रतीक हैं। द्वारका में कृष्ण के श्रृंगार का बहुत महत्व है। सुबह 10:30 बजे की श्रृंगार आरती में उन्हें एक
राजा की तरह सजाया जाता है। उनके श्रृंगार पे वहां के मुख्य पुजारी कहते है - " द्वारकाधीश राजा हैं तो राजा को राजा की तरह ही सजाना पड़ेगा "। द्वारकाधीश का श्रृंगार बिभिन्न प्रकार के फूलों , रेसम के बस्त्रों, रत्नो और
आभुषणो से किया जाता है। आम तौर पर इस मंदिर में रोज़ाना दस हज़ार लोग आते हैं , लेकिन ये संख्या कृष्ण जन्मास्ठमी में बढ़कर एक से डेढ़ लाख तक हो जाता है।
द्वारकाधीश मंदिर की ध्वजा
द्वारकाधीश के शिखर पे लगी 52 गज की ध्वजा दिन में पांच बार बदली जाती है। ऐसा कहते हैं की ये लोगो की मनोकामना पूरी करती है। कोई भक्त चाहे तो दान में ध्वजा चढ़ा सकता है। लेकिन ध्वजा चढाने वाले भक्तों की संख्या इतनी ज्यादा होती है की आपको २ साल से ज्यादा का इंतज़ार करना पड़ सकता है । जब किसी भक्त की मन्नत पूरी हो जाती है तो वो ध्वजा लगाते हैं। रोज सैकड़ो लोगों की मन्नते पूरी होती है और इस प्रकार ध्वजा लगाने वालो की संख्या भी बढ़ते जाती है।
महारानी रुक्मिणी देवी का मंदिर
महारानी रुक्मिणी देवी का मंदिर द्वारकाधीश मंन्दिर से दो किलोमीटर दुरी पे है। लोग मानते हैं की ये मंदिर मूलतः ढाई हज़ार साल पहले बना था। लेकिन उसके बाद इसका कई बार पुनर निर्माण हुआ। द्वारकाधीस के दर्शन के बाद रुक्मिणी देवी का दर्शन करने लोग जरूर जाते है, नहीं तो आपकी यात्रा अधूरी रह जाती है। रुक्मिणी देवी और द्वारकाधीश मंन्दिर के अलग होने के पीछे भी कहानी है। ऐसा लोग कहते हैं की ऋषि दुर्बासा ने शाप दिया था की श्री कृष्ण और रुक्मिणी देवी की मूर्ति कभी साथ नहीं रहेगी।
द्वारकाधीश मंदिर तक कैसे पहुंचे?
अगर आप हवाई जहाज से यात्रा करना चाहते हैं तो निकटतम हवाईअड्डा जामनगर में है जो द्वारका से 131 किमी दूर है। द्वारकाधीश मंदिर का निकटतम रेलवे स्टेशन में ही है।
द्वारका रेलवे स्टेशन से द्वारकाधीश मंदिर की दूरी सिर्फ 1 किमी है। द्वारका पहुंचने के लिए रोडवेज बस की भी सुबिधा है। अगर आप आस-पास से आना चाहते हैं तो बस ले सकते हैं।
By Road
Delhi to Dwarka -1300KM 23 hrs
Mumbai to Dwarka - 936 KM 18 hrs
Bangalore to Dwarka - 1900 KM 35 hrs
Hyderabad to Dwarka - 1500 KM 30 hrs
द्वारकाधीश मंदिर जाने का सही समय
द्वारका जाने का सही समय नवंबर से फरवरी के आखिरी तक है जब शहर में ठंड का अनुभव होता है। यदि आप द्वारका के भव्य रूप से मनाए जाने वाले जन्माष्टमी महोत्सव में भाग लेना चाहते हैं, तो अगस्त और सितंबर के दौरान शहर का दौरा करना बहुत आनंदपूर्ण होगा।
द्वारकाधीश मंदिर के पास रुकने का स्थान
मंदिर के पास बहुत से होटल्स और होम स्टे मिल जाते हैं। आप चाहे तो पहले से ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं। आप वहां पहुंचने के बाद भी बुकिंग कर सकते हैं। लेकिन अगर आप त्यौहार में जा रहे हैं तो बेहतर होगा की पहले से ऑनलाइन बुकिंग कर ले। इसके अलावा वहां बहुत सारे धर्मशाला भी हैं। इन सबकी जानकारी इंटरनेट पे उपलब्ध है। आप अपने बजट के अनुसार रहने के स्थान का चुनाव कर लें। कोशिश करें की मंदिर से नज़दीक ही रहने का जगह बुक करें।
द्वारकाधीश मंदिर के आसपास घूमने की जगह
- रुक्मिमी देवी का मंन्दिर
- गोमती घाट
- नागेश्वर ज्योतिर्लिंग ( यहाँ भगवान शिव की विशाल और सुंदर प्रतिमा है)
- बेट द्वारका (द्वारका से 33 किलोमीटर दूर है ये टापू )
- द्वारका का समुद्र तट
- द्वारका लाइट हाउस
- सुदामा सेतु (गोमती नदी को पार करने के लिए पैदल यात्रियों के लिए बनाया गया)
द्वारका नगरी के पास घूमने की जगह
सोमनाथ मंदिर- सोमनाथ मंदिर (जो देव पाटन के रूप में भी जाना जाता है) गुजरात के पश्चिमी तट पर सौराष्ट्र में वेरावल के पास प्रभास पाटन में स्थित है। यह मंदिर भगवान शिव
के बारह ज्योतिर्लिंग मंदिरों में पहला माना जाता है। यह द्वारका से करीब 240 KM है। आप अगर भारत सुदूर हिस्से से आ रहे हैं तो सोमनाथ मंदिर को भी अपने यात्रा में शामिल कर सकते हैं।
महात्मा गाँधी का जन्म स्थान, पोरबंदर- द्वारका से सोमनाथ के जाते समय आप पोरबंदर होक जा सकते हैं, पोरबंदर में महात्मा गाँधी का जन्म स्थान है आप चचे तो इसे भी अपने यात्रा में शामिल कर सकते हैं।
द्वारकाधीश मंदिर के यात्रा का कार्यक्रम- itinerary
दिन 1- द्वारका आगमन और विश्राम, शाम को स्थानीय दर्शनीय स्थल घूमे और इच्छा हो तो लोकल खरीदारी करें।
दिन 2- सुबह द्वारकाधीश मंदिर दर्शन, उसके बाद दुसरे मत्वपूर्ण स्थान घूम ले, फिर नाव की फेरी से बेट द्वारका घूम ले। आप ओखा से नाव की फेरी से बेट द्वारका जा सकते हैं
दिन 3- द्वारका से पोरबंदर या सीधे सोमनाथ, शाम को सोमनाथ में आसपास की जगह घूम ले
दिन 4- सुबह सोमनाथ मंदिर में दर्शन, उसके बाद अपने घर के लिए प्रस्थान करें
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