भारत के प्रसिद्ध मंदिर

मिनाक्षी अम्मन मंदिर, मुदरै, तमिलनाडु | Meenakshi Amman Temple

तमिलनाडु के मुदरै शहर में स्थित है भव्य, विशाल और वास्तुकला का बेजोड़ उदहारण - मिनाक्षी अम्मन मंदिर। यह मंदिर मुदरै शहर (तमिलनाडु) के मध्य में स्थित है। यह मंदिर पंड्या शाशन काल के दौरान बनाया गया था और ये मंदिर देवी मिनाक्षी और भगवान् सुंदरेश्वर (भगवान् शिव) को समर्पित है। इसका प्रवेश द्वार जिसे गोपुरम कहते हैं, 15 मंजिली इमारत जितना ऊंचा है। इसके गोपुरम पे लगभग 1500 उत्क्रिस्ट मूर्र्तियाँ है, ये मूर्तियां देवी देवताओं और राक्षशों के हैं। इन मूर्र्तियोंन को बिभिन्न प्रकार के सुदंर रंगो से सजाया गया है। मिनाक्षी अम्मन मंदिर भारत के सबसे पुराने और बड़े मंदिरों में से एक है। यह मंदिर लगभग 2500 साल पुराना है। इस मन्दिर में शिव की नटराज मुद्रा भी स्थापित है।

मिनाक्षी अम्मन मंदिर, meenakshi temple

मिनाक्षी अम्मन मंदिर- पौराणिक कथा

मदुरई के पंड्या वंश के राजा मलयध्वज का कोई संतान नहीं था। राजा मलयध्वज संतान पाने के लिए यज्ञ की और भगवन शिव से पुत्र प्रदान करे का अनुरोध किया। लेकिन हवन कुंड की आग से तीन स्तन वाली तीन बर्ष आयु की पुत्री अवतरित हुई। राजा मलयध्वज और उनकी पत्नी ने आग से उत्पन्न पुत्री के असामान्य स्थिति पे दुखी हो गए, तभी एक दिव्य आवाज़ ने उन्हे लड़की के शारीरिक स्थिति पर ध्यान न देने के लिए कहा, साथ में ये भी कहा की लड़की का तीसरा स्तन उसके भावी पति से मिलते ही बिलुप्त हो जायेगा। राजा ने अपने पुत्री का नाम मिनाक्षी रखा, उसके बड़ी पर राजा ने उसे अपन्ना उत्तराधिकारी बना दिया। अपने राज में उन्होंने ने बहुत से राजाओं और देवताओं को परास्त किया, बाद में वो स्वयं भगवन शिव को परास्त करने कैलाश पर्वत गयी। जब भगवन शिव सामने आये तो लज्जित हो गयीं और उनका तीसरा स्तन अन्तर्ध्यान हो गया। यज्ञ के समय हुई भविस्यबाणी सही हो गया। श्री मिनाक्षी और भगवन शिव का विवाह देवताओं, संतो और नंगरिकों के उपस्थिति में हुआ। इस विवाह को मीनाक्षी सुंदरेश्वरर थिरु’कल्याणम त्यौहार के रूप में मनाया जाता है। मीनाक्षी थिरुक्कल्याणम, देवी मीनाक्षी और भगवान शिव(सुंदरेश्वर रूप) का दिव्य विवाह है। इस त्यौहार को चितिरई तिरुविझा के नाम से भी जाना जाता है। यह मदुरै में मनाया जाने वाला एक प्रमुख वार्षिक त्यौहार है।

मिनाक्षी मंदिर का निर्माण

पुराणों के अनुसार मंदिर का पहला निर्माण 3500 साल पहले (1500 ईशा पूर्व) बताया गया है। पुराण के एक कथा के अनुसार - कदम्बा पेड़ की निचे भगवन शिव का एक लिंग था, माना जाता है की स्वयं इन्द्र देवता ने अपने पांपों के प्रायश्चित के लिए इस लिंग को स्थापित किया था। एक ब्यापारी (धनंजयन) ने संयोग से इस इस मंदिर को बन के बीच में देखा। उस ब्यापारी ने इसकी जानकारी उस समय के राजा कुलशेखर पांड्यन को दी। उस समय राजधानी मनवूर थी। राजा कुलशेखर पांड्यन ने मंदिर के चारो तरफ के बन को साफ़ करवाया और बस्ती बसाई। आगे चलकर ये बस्ती बड़े नगर में बिकसित हुआ। आरम्भ में ये मंदिर लड़ियों से बना होगा, बाद में ईंटो और गारो से, बाद में सातवीं शताब्दी में बड़े पथ्थरों से इसका निर्माण हुआ होगा।

आधुनिक मंदिर के निर्माण का शुरुआत 7 वी शताब्दी में हुआ था। इसके बाद इस मंदिर ने मुगलो का आक्रमण झेला। मुस्लिम कमांडर मलिक काफूर के नेतृत्व में दिल्ली सल्तनत की सेनाओं ने 14 वीं शताब्दी की शुरुआत में मंदिर के कीमती सामान को लूट लिया, और दक्षिण भारत के कई अन्य मंदिर कस्बों के साथ मदुरै मंदिर शहर को नष्ट कर दिया। आज का मिनाक्षी मंदिर विजयनगर साम्राज्य के शासकों द्वारा शुरू किए गए पुनर्निर्माण के प्रयासों का परिणाम है, जिन्होंने मंदिर का पुनर्निर्माण किया और मंदिर को फिर से खोला। 16 वीं शताब्दी में नायक शासक द्वारा मंदिर परिसर का और अधिक विस्तार और सुदृढ़ीकरण किया गया। आज हम जिस मंदिर को देखते हैं इसका बड़ा भाग 16 वी शताब्दी में नायक वंश द्वारा निर्माण करवाया गया है जो 17 एकड़ में फैला है।
मिनाक्षी अम्मन मंदिर, मुदरै, तमिलनाडु नायक वंश ने मंदिर परिसर को और भी विशाल बनवाया तथा वास्तु का विशेष ध्यान रखा जो द्रविड़ वास्तु कला का सुन्दर उदहरण है। मंदिर का परिसर चारों तरफ से विशाल दीवारों से घिरा है तथा हर दिशा में विशाल प्रवेश द्वार बने हुए हैं। इनके प्रवेश द्वार को गोपुरम कहते हैं जो की बहु-मंजिली इमारत जितनी ऊँची है। इसके प्रवेश द्वार (गोपुरम) पे सैकड़ो देवी, देवताओं, राक्षसों और जानवरों की मूर्तियां हैं। आज के मंदिर में 14 प्रवेश द्वार (गोपुरम) हैं, जिनकी ऊंचाई 45-50 मीटर है, दक्षिणी गोपुर 51.9 मीटर (170 फीट) से अधिक है। मंदिर का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में है।

मंदिर परिसर में दो गर्भ ग्रृह है , एक मिनाक्षी देवी (माता पार्वती ) और दूसरा सुंदरेश्वर (भगवन शिव) को। गर्भ ग्रृह के उपर स्वर्णा कलश है।
मदुरै प्रवेश द्वार, Madurai gopuram मंदिर के उत्तर-पूर्व दिशा में एक विशाल मंडप है जिसमे करीब 1000 स्तम्भ लगे हैं। वास्तव में वहां 985 स्तंभ ही हैं लेकिंन इसे हज़ार स्तम्भ वाला मंडप कहा जाता है। इन् स्तभों पे देवताओं, राक्षशों और अद्भुत जांनवरों की मूर्र्तियाँ है। इस मंडप का उपयोग नृत्य, कला और राजा के दर्शन के लिए किया जाता था। आज इस हज़ार स्तम्भ वाले मंडप को संग्रहालय के रूप में उपयोग किया जाता है। इस संग्रहालय में मुर्तिया, चित्रकला और मंदिर से जुडी इतिहास को रखा गया है। मंदिर के अंदर एक पवित्र तालाब भी है, इस तालाब का नाम पोत्रमरै कूलम है। पोत्रमरै कूलम का मतलब - सुनहरे कमल वाला तालाब। तालाब के चारो तरफ भवन का बरामदा है। यह पवित्र सरोवर 165 फ़ीट लम्बा एवं 120 फ़ीट चौड़ा है।

पोत्रमरै कूलम

मिनाक्षी मंदिर में पूजा का समय तथा उत्सव और त्यौहार

भगवती मिनाक्षी इस मंदिर की मुख्य देवी है। प्रचलित रीती ऐसी बन गयी है की मंदिर के अंदर उसी पूर्वी प्रवेश द्वार से प्रवेश करते हैं जो श्री मिनाक्षी देवी के सामने खुलता है। मंदिर के द्वार दर्शनों के लिए प्रातः काल 5:00 बजे खुलते है। मंदिर दोपहर 12 :30 बजे से शाम 4 बजे तक बाद रहता है। फिर सांयकाल में 4:00 बजे से रात 9:30 तक दर्शन होते हैं।

thirukalyanam festival madurai थिरु’कल्याणम मदुरै में मनाया जाने वाला एक प्रमुख वार्षिक त्यौहार है। यह साल के चैत्र माह (हिंदी महीने के अनुसार) यानि की अप्रैल और मई में मनाया जाता है। यह दुनिया का सबसे लंबा मनाये जाने वाला उत्सव माना जाता है जो एक महीने की अवधि के लिए रहता है। त्यौहार का पहला 15 दिन देवी मीनाक्षी (देवी पार्वती के एक अवतार) को समर्पित हैं और शेष 15 दिनों को अलवर (मीनाक्षी के बड़े भाई है ) के लिए मनाया जाता है, जिन्हें महाविष्णु के रूप में जाना जाता है। अलगर (भगवन बिष्णु), भगवान शिव और मीनाक्षी के विवाह समारोह में भाग लेने के लिए मदुरै आये थे।

मिनाक्षी मंदिर मंदिर तक कैसे पहुंचे?

वैसे तो मदुरै में हवाई अड्डा है लेकिन इसके अलावा चेन्नई , कोयम्बटूर बैंगलोर भी नज़दीकी हवाई अड्डा है। मदुरै में रेलवे स्टेशन भी है, तो आप ट्रैन से भी यहां पहुंच सकते हैं। मदुरै शहर तक के लिए बस की कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है।

मिनाक्षी मंदिर के पास घूमने की जगह

मदुरै में आप थिरुमलाई नायकर महल देख सकते हैं, यह पैलेस द्रविड़ियन और राजपूत शैलियों का एक क्लासिक फ्यूजन हैं। इसके अलावा आप गाँधी मेमोरियल म्यूजियम देख सकते हैं , यहाँ भारत के स्वतंत्रता से सम्बंधित फोटोज और गाँधी जी से सम्बंधित चीजे देखने को मिलेंगी।

मिनाक्षी मंदिर से नज़दीक में थंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर और रामेश्वरम का रामनाथस्वामी मंदिर है।ये दोंनो मंदिर मदुरै से लगभग 180 किलोमीटर की दुरी पर है। बृहदीश्वर मंदिर , थंजावुर तमिलनाडु में है और मिनाक्षी मंदिर से उत्तर दिशा में लगभग 180 किलोमीटर दूर है जिसको 4 घंटे में तय किया जा सकता है। मिनाक्षी मंदिर से लगभग 170 किलोमीटर दूर दक्षिण दिशा में रामेश्वरम का मंदिर है और इसको भी 4 घंटे में ट्रेन से तय किया जा सकता है। इसके अलावा दक्षिण भारत में बहुत सारे मंदिर हैं जो आप घूम सकते हैं।

मिनाक्षी मंदिर, मुदरै जाने का सही समय

वैसे तो आप यहाँ कभी भी आ सकते हैं, लेकिन सर्दियों में तापमान थोड़ा काम रहता है इसलिए ये समय ज्यादा अनुकूल है। अप्रैल और मई के समय एक महीने का विश्व प्रसिद्ध थिरुकल्याणम त्यौहार मनाया जाता, इस अवधि में यात्रियों की संख्या बहुत ज्यादा होती है , लेकिन इसमें भाग लेना भी बहुत शानदार अनुभव होता है। अगर आप भीड़ से बचना चाहते हैं तो आप इस त्यौहार के बाद ये पहले अपना आने का कार्यक्रम बनायें।

मिनाक्षी मंदिर के पास रुकने का स्थान

मंदिर के पास बहुत से होटल्स और होम स्टे मिल जाते हैं। आप चाहे तो पहले से ऑनलाइन बुकिंग कर सकते हैं। आप वहां पहुंचने के बाद भी बुकिंग कर सकते हैं। लेकिन अगर आप त्यौहार में जा रहे हैं तो बेहतर होगा की पहले से ऑनलाइन बुकिंग कर ले। आप अपने बजट के अनुसार रहने के स्थान का चुनाव कर लें। कोशिश करें की मंदिर से नज़दीक ही रहने का जगह बुक करें।

मिनाक्षी मंदिर के यात्रा का कार्यक्रम- itinerary

दिन 1- मदुरै आगमन और विश्राम, शाम को स्थानीय दर्शनीय स्थल घूमे और इच्छा हो तो लोकल खरीदारी करें, यहाँ से चाहें तो आप सिल्क की साडी खरीद सकते हैं ।
दिन 2- सुबह मिनाक्षी मंदिर दर्शन, उसके बाद आप मदुरै में घूमना चाहते हैं तो घूम ले, अगर आपका रामेश्वरम मंदिर या थंजावुर का बृहदीश्वर मंदिर देखने जाने का प्लान है तो अपनी यात्रा आरम्भ करें

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