मद्महेश्वर मंदिर (पंच केदार), उत्तराखंड | Madmaheshwar Temple, Panch Kedar
उत्तराखंड में स्थित एक तरफ से हिमालय की पहाड़ियों से घिरा तथा दूसरी ओर से हरी-हरी घास के मैदान से घिरा है मदमहेश्वर मंदिर, जिसकी पृष्ठभूमि में घने वन हैं। सैकड़ो वर्ष पुराना मदमहेश्वर मंदिर के चारो तरफ मनोरम दृश्य है। मंदिर की वास्तुकला एक उत्कृष्ट उत्तर भारतीय शैली की है। इसके आस पास गाँव के घर हैं।
मंदिर भगवान शिव को समर्पित है जो प्रसिद्ध पंच केदारों में से एक है। यह पंच केदार तीर्थयात्रा सर्किट में आने वाला चौथा मंदिर है; पंच केदार तीर्थयात्रा के मंदिर में- केदारनाथ , मद्महेश्वर, तुंगनाथ, रुद्रनाथ, और कल्पेश्वर का मंदिर आता है। इस मंदिर के बैल के नाभि को शिव का दिव्य रूप माना जाता है। इस मंदिर की निकट जाने से आध्यात्मिक जीवंत रूप में महसूस होने लगती है। स्थानीय लोग मद्महेश्वर को मदमहेश्वर कहते हैं जिसका शाब्दिक अर्थ है मदिरा वाले भगवान। मंदिर में की जाने वाली आरती में पुरे गांव के लोग शामिल होते हैं।
मंदिर का निर्माण
माना जाता है कि 5 पांडव भाई में से दूसरे पांडव भाई भीम ने इस मंदिर का निर्माण कराया था और यहां शिव की पूजा की थी। मुख्य मंदिर के दाईं ओर एक छोटा मंदिर है जहाँ गर्भगृह में सरस्वती की संगमरमर की प्रतिमा स्थापित है। यहाँ इसके अलावा दो अन्य छोटे मंदिर हैं, जिनमें से एक शिव की पत्नी पार्वती और दूसरा अर्धनारीश्वर को समर्पित है।
पौराणिक कथा - कैसे मद्महेश्वर में भगवन शिव साक्षात् प्रकट हुए ?
ऐसा कहा जाता है कि पांडव महाभारत के युद्ध के बाद बहुत दुखी थे।उन्हें अपने कौरव बंधुओं को मारने का बहुत दुःख था। इसीलिए वे अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए भगवान शिव के पास जाना चाहते थे। लेकिन भगवान शिव उनसे मिलना नहीं चाहते थे। इसलिए भगवान शिव गुप्तकाशी में छिप गए।गुप्त कशी में भगवन शिव नंदी बैल के रूप में पाण्डवों को दिखे। पहले पांडव उनको नहीं पहचान पाए लेकिन उंनका सुंन्दर और अद्भुत रूप देख के समझ गए की यही भगवन शिव हैं। भीम ने उन्हें पकड़ना चाहा लेकिन वो नहीं पकड़ पाए। भगवांन शिव जो की गुप्त कशी से अदृश्य हो चुके थे अब पांच अलग जगह पे प्रकट हुए। इस प्रकार पंच-केदार का जन्म हुआ। पांच केदार वो पांचो जगह का समूह हैं जहाँ वो प्रकट हुए थे।इन पांचो जगहों पे उनके शरीर का एक भाग प्रकट हुआ था। और वो पांच जगह हैं - केदारनाथ में पीठ, रुद्रनाथ में चेहरा, तुंगनाथ में भुजाएं, मध्यमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा वाले बाल।
बूढ़ा मद्महेश्वर का मंदिर
मद्महेश्वर मंन्दिर से ऊपर की ओर ऊचाई पे है बूढ़ा मद्महेश्वर का मंदिर, जोकि पहाड़ की चोटी पे है। इसके लिए आपको ट्रैक करके जाना होगा। बुड़ा मद्महेश्वर के आस पास के पहाड़ बर्फ से घिरे रहते हैं। वहां एक छोटा सा ताल भी है जिसमे पास के पहाड़ो का प्रतिबिम्ब दिखाई देता है, जो बहुत सुन्दर लगता है। अगर आप मद्महेश्वर मंन्दिर के पास गांव में रात को रुक रहे हैं तो अगले दिन सुबह बुड़ा मद्महेश्वर का दर्शन करने और और वादियों का सुन्दर दृश्य देखने जरूर जाए। वहां का दृश्य बड़ा ही सुन्दर और मनमोहक है।
मद्महेश्वर मंदिर जाने का सही समय
केदारनाथ और बद्रीनाथ की तरह मदमहेश्वर का मंदिर भी साल के छह माह ही दर्शन के लिए खुला रहता है। हिमालय की पहाड़ियों के बीच होने की वजह से वहां बहुत बर्फ़बारी होती है। इस दौरान वहां जाना संभव नहीं है। इसलिए गर्मी के मौसम में मई महीने से लेकर नवंबर तक ये मंदिर खुला रहता है, इसके बाद इसके कपाट बंद कर दिए जाते हैं। जब मंदिर के कपाट खुलते हैं तो भगवन का डोली ओम्कारेश्वर मंदिर (उखीमठ) से निकलता है।
मद्महेश्वर मंदिर जाने का रास्ता
मद्महेश्वर मंदिर जाने के लिए पैदल ट्रैक का शुरुआत रांसी गांव से होता है। रांसी गांव पहुंचने के लिए आपको उखी मठ से शेयरिंग में जीप मिल जायेगा। रांसी गांव से मद्यमहेस्वर की दूरी यह से लगभग 17-18 किलोमीटर है। लेकिन आप दूरी की चिंता न करें, इसके रस्ते में आने वाले दृश्य (नदी, पहाड़, झरना, हरियाली और जंगल) इतने सुन्दर हैं की आपका मन उसी में अटका रहता है और आपका रास्ता मनमोहक दृश्य देखते हुए काट जाता है। इसके लिए आपको पहाड़ो के बीच से पैदल जाना है। रास्ते पगडण्डी वाले है लेकिन ठीक ठाक अवस्था में हैं। इसके रास्ते में अगला गांव आता है गौंडार गांव, जोकि 5 किलोमीटर दूर है । गौंडार गांव से आगे बंतोली गांव आता है जहाँ से होकर मधु गंगा नदी गुजरती है। इसको बंतोली संगम भी कहते हैं। बंतोली संगम का दृश्य बड़ा ही सुन्दर है। अगर आपके पास समय है तो इसको जरूर देखें। । अगला गांव जो रास्ते में आता है वो है खाडारा खाल गांव, उसके आगे आता है नानू गांव। नानू गांव से आगे आता है मैखम्बा गांव, फिर कून चट्टी और आखिर में कून चट्टी गांव से 3 किलोमीटर दूर है मद्महेश्वर का मंदिर ।
पुरे रास्ते में थोड़े थोड़े दुरी पे गांव आते हैं, हर एक गांव में खाने और रहने का इंतज़ाम है (होम स्टे)। आप यात्रा की शुरुआत दिन में कभी भी कर सकते हैं , आप जहाँ तक दुरी तय कर सकते है करिये और फिर किसी गांव में रात को विश्राम कर लीजिये। आमतौर पे लोग रांसी गांव से सुबह यात्रा आरंभ करते है और शाम तक मद्यमहेस्वर मंदिर पहुंच जाते हैं , मद्यमहेस्वर मंदिर के पास गांव में रहने का इंतज़ाम है (होम स्टे) और खाने के इन्तेज़ाम मिल जाता है।
Haridwar to Rishikesh 22 km
Rishikesh to Guptkashi 181KM
Guptakashi to ukhiMath 17KM
Ukhimath to Ransi Gaon 22KM
Ransi Gaon to Madmaheswar temple 17KM (रांसी गांव के आगे 2 किलोमीटर तक ही वाहन जा सकता है, उसके बाद का रास्ता पैदल ही पार करना है।)
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