केदारनाथ मंदिर, उत्तराखंड | Kedarnath Temple
केदारनाथ मंदिर, एक हिंदू मंदिर है जो शिव को समर्पित है। मंदाकिनी नदी के पास गढ़वाल हिमालय श्रृंखला पर स्थित, केदारनाथ भारत के उत्तराखंड राज्य में स्थित है। केदारनाथ शिव मंदिर हिन्दुओं के पवित्र स्थानों में से एक हैं। यह पवित्र हिंदू मंदिरों के बारह ज्योतिर्लिंगों में से एक है और हिन्दुओं के चार धामों में से एक हैं। यह मंदिर वास्तव में कितना पुराना हैं इसका अनुमान लगन मुश्किल हैं लेकिन ऐसा कहा जाता हैं की यह मंदिर 1,200 वर्ष से अधिक पुराना है। यह मंदिर 85 फीट ऊंचा, 187 फीट लंबा और 80 फीट चौड़ा है।
केदारनाथ मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथाएं
एक कथा के अनुसार - नर और नारायण दोनो ही भगवन विष्णु के अवतार थे। ये दो विष्णु के अवतार बद्रीकाश्रम में घोर तपस्या करने लगे।भगवान शिव उनके घोर तपस्या समर्पण भाव से प्रसन्न हुए और उनके सामने प्रकट हुए और उन्हें कुछ मांगने को कहा। नर नारायण ने शिव से अनुरोध किया कि वे मानवता के कल्याण के लिए केदारनाथ में ज्योतिर्लिंग के रूप में अपना स्थायी निवास बनाएं। भगवान शिव ने उनकी बात मन ली और वही वास् करने लगे, जिसे अब केदारनाथ के नाम से जाना जाता है।
एक और कथा के अनुसार - ऐसा कहा जाता है कि पांडव महाभारत के युद्ध के बाद बहुत दुखी थे।उन्हें अपने कौरव बंधुओं को मारने का बहुत दुःख था। इसीलिए वे अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए भगवान शिव के पास जाना चाहते थे। लेकिन भगवान शिव उनसे मिलना नहीं चाहते थे। इसलिए भगवान शिव गुप्तकाशी में छिप गए।गुप्त कशी में भगवन शिव नंदी बैल के रूप में पाण्डवों को दिखे। पहले पांडव उनको नहीं पहचान पाए लेकिन उंनका सुंन्दर और अद्भुत रूप देख के समझ गए की यही भगवन शिव हैं। भीम ने उन्हें पकड़ना चाहा लेकिन वो नहीं पकड़ पाए। भगवांन शिव जो की गुप्त कशी से अदृश्य हो चुके थे अब पांच अलग जगह पे प्रकट हुए। इस प्रकार पंच-केदार का जन्म हुआ। पांच केदार वो पांचो जगह का समूह हैं जहाँ वो प्रकट हुए थे।इन पांचो जगहों पे उनके शरीर का एक भाग प्रकट हुआ था। और वो पांच जगह हैं - केदारनाथ में पीठ, रुद्रनाथ में चेहरा, तुंगनाथ में भुजाएं, मध्यमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा वाले बाल।
केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया ?
मूल केदारनाथ मंदिर का निर्माण किसने और कब किया था यह निश्चित नहीं है और इसका कोई शाक्ष्य प्रमाण नहीं है। हिंदू किंवदंतियों के अनुसार, मंदिर सबसे पहले पांडवों द्वारा बनाया गया था। पांडवों ने केदारनाथ में ही तपस्या करके शिव को प्रसन्न किया था। लेकिन इसका महाभारत में कोई उल्लेख नहीं मिलता। वहां के स्थानीय लोगों में कई कहानियाँ प्रचलित हैं। मंदिर का पुनर निंर्माण 8 वीं शताब्दी ईस्वी में आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा किया गया था। केदारनाथ का सबसे पहला संदर्भ 7 वीं और 8 वीं शताब्दी में स्कंद पुराण में मिलता है। स्कंद पुराण के अनुसार, केदारनाथ वो स्थान है जहां शिव अपने बालों से पवित्र गंगा को निकलते है।
केदारनाथ मंदिर तक पहुंचने का रास्ता
मंदिर तक जाने के लिए वाहन का इस्तेमाल नहीं कर सकते, क्योंकि मंदिर तक जाने के लिए सड़क नहीं है। गौरीकुंड तक ही वाहन जाने का रास्ता है। इसीलिए यह यात्रा गौरीकुंड से शुरू होता है । वहां से हिमालय के पहाड़ों के साथ एक लंबा ट्रेक है। वहां पहुंचने के लिए १४ मिल (२२ किलोमीटर ) का पैदल यात्रा करना पड़ता है। यह रास्ता आसान नहीं है। उच्चाई के साथ यात्रा और मुश्किल होती जाती है। मंदिर तक पहुँचने के लिए खच्चर और पिठू सेवा उपलब्ध है। पिठू वो है जो यात्रिओं को अपने पीठ पे लेके जाते हैं और बदले में पैसा लेते है। जो लोग हवाई जहाज से यात्रा करना चाहते हैं वो देहरादून तक हवाई जहाज से पहुंच सकते हैं। हवाई अड्डे से बहार कैब और टैक्सी किराए पर ली जा सकती हैं। देहरादून शहर और हरिद्वार से अच्छी तरह जुड़ा हुआ है और हरिद्वार तक बस द्वारा भी जा सकते हैं। ट्रेन के यात्रियों को ऋषिकेश रेलवे स्टेशन उतरना होगा, वहां से बस, कैब या टैक्सी मिल जायेगा। आप हरिद्वार या ऋषिकेश से बस या कैब या टैक्सी ले सकते है। वाहन से आप सिफत गौरीकुंड तक ही जा सकते हैं , क्युकी उसके आगे का रास्ता सिर्फ पैदल ही पर किआ जा सकता हैं। गौरी कुंड से जैसे जैसे आप आगे जाते हैं, रास्ता दुर्गम होता जाता हैं। इसलिए आप खच्चर या पिठू का भी सहारा ले सकते हैं
केदारनाथ मंदिर खुलने का समय
अत्यधिक ख़राब मौसम और दुर्गम रस्ते के कारण, मंदिर केवल अप्रैल महीने के अंत से लेकर अक्टूबर नवंबर के महीनों के बीच आम जनता के लिए खुलता हैं। मंदिर खुलने का समय वहां के प्रमुख पुजारी निकलते हैं। मानसून के समय वहां का रास्ता बहुत ही खतरनाक हो जाता हैं इसलिए उस समय लोग यात्रा नन्ही करते। मानसून के बाद फिरसे यात्रा प्रारम्भ हो जाता हैं।अक्टूबर के बाद जब बर्फ़बारी होती हैं तो मंदिर का दरवाजा बंद कर दिए जाता हैं।
Itinerary, केदारनाथ मंदिर यात्रा का कार्यक्रम
मंदिर केवल अप्रैल महीने के अंत से लेकर अक्टूबर नवंबर के महीनों के बीच खुलता हैं। लेकिन मानसून के समय वहां जाना सही नहीं है, मानसून के समय पहाड़ो में बहुत भूस्खलन होता है। इसलिए मानसून से पहले या बाद
में जाने का कार्यक्रम बनाये। उत्तराखंड तो देव भूमि है। यहाँ हर जगह देवी देवताओं की मंदिर है, अगर आप एक महीने का भी समय लेकर आते है तो शायद कम पड़ जाए। इसलिए अपने जगहों का चुनाव कर ले और उसी के
हिसाब से यात्रा का कार्यक्रम बनाये।
आप बद्रीनाथ और केदारनाथ जाने का कार्यक्रम बना सकते है। इसके अलावा अगर आपके पास समय है तो आप छोटा चारधाम या पंचकेदार का कार्यक्रम बना सकते हैं।
केदारनाथ मंदिर के पास रुकने का स्थान
केदारनाथ मंदिर के पास रुकने का बहुत स्थान है। आपको टेंट या लॉज मिल जाएगा।
केदारनाथ मंदिर जाने का सही समय
बद्रीनाथ की तरह केदारनाथ का मंदिर भी साल के छह महीने ही दर्शन के लिए खुला रहता है। हिमालय की पहाड़ियों के बीच होने की वजह से बहुत बर्फ़बारी होती है। इस दौरान वहां जाना संभव नहीं है। इसलिए गर्मी के मौसम में मई महीने से लेकर नवंबर तक ही ये मंदिर खुला रहता है, इसके बाद इसके कपाट बंद कर दिए जाते हैं। जब मंदिर के कपाट खुलते हैं तो भगवन का डोली ओम्कारेश्वर मंदिर (उखीमठ) से निकलता है। केदार नाथ जाने का सही समय मई से नवंबर तक है , लेकिन बीच में मानसून के समय वहां जाने से बचे। मानसून में बारिश होने के कारण वहां हिम स्खलन होता है।
केदारनाथ मंदिर के आसपास घूमने की जगह
उत्तराखंड तो देव भूमि है। यहाँ सिर्फ पवित्र मंदिर ही नहीं अपितु हमारे देश कि पवन नदियां जैसे गंगा, यमुना, अलकनंदा इत्यादि इधर से ही होकर गुजरती हैं। हिमालय कि पर्वत श्रेणियों के पास होने कि वजह से यहाँ कि प्राकृतिक सुंदरता बहुत ही ज्यादा है। अगर आप एक महीने का भी समय लेकर आते है तो शायद कम पड़ जाए। इसलिए आप अपने समय और शारीरिक स्थिति के अनुसार यात्रा का कार्यक्रम बनाये।
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