तुंगनाथ मंदिर (पंचकेदार), Tungnath Temple- PanchKedar
तुंगनाथ मंदिर, पंच केदार तीर्थ के मंदिरो में से एक है। यहाँ भगवान ह्रदय और भुजाओं के रूप में बिराजमान हैं। यह शिव मंदिरों में से सबसे ऊंचे स्थान पे बिराजमान मंदिर है। इसके आस पास के हिमालय क्षेत्र में पंच केदार है। पांडवो को दर्शन देने के लिए भगवान शिव पाँच जगह प्रकट हुए थे , केदारनाथ में शरीर के पिछले भाग (पीठ) के रूप में प्रकट हुए थे, मद्महेश्वर में नाभि के रूप में प्रकट हुए थे, तुंगनाथ में ह्रदय और भुजाओ के रूप में प्रकट हुए थे, मुख के रूप में रुद्रनाथ में प्रकट हुए थे और कल्पेश्वर में जटाओ के रूप में प्रकट हुए थे।
मंदिर का निर्माण
ऐसी मान्यता है की इस मंदिर का निर्माण पांडवो ने हज़ारो वर्षो पहले किया था। किन्तु इसका पुनर्निर्माण आदि गुरु शंकराचार्य ने आठवीं शताब्दी में करवाया।
पांडव महाभारत के युद्ध के बाद पश्चाताप करना चाहते थे। उन्होंने गोत्र और ब्राह्मणहत्या के पापों का प्रायश्चित करने के लिए भगवान शिव के दर्शन हेतु हिमालय की ओर प्रस्थान किया। हिमालय पहुंचकर (आज का उत्तराखंड के हिमालय वाला भाग) उन्होंने पंचकेदार मंदिरो का निर्माण किया। भगवान शिव ने इन्ही पांचो जगह पर पांडवो को अपने शरीर के अलग अलग रूप में दर्शन दिए थे। पांडवो द्वारा निर्मित इन पाँच मंदिरो के समूह को पंचकेदार कहा जाता है। जैसे दर्शनार्थी चार धाम यात्रा करते हैं वैसे ही पंचकेदार यात्रा भी करते है।
पौराणिक कथा - कैसे तुंगनाथ में भगवन शिव साक्षात् प्रकट हुए ?
ऐसा कहा जाता है कि पांडव महाभारत के युद्ध के बाद बहुत दुखी थे।उन्हें अपने कौरव बंधुओं को मारने का बहुत दुःख था। इसीलिए वे अपने पापों का प्रायश्चित करने के लिए भगवान शिव के पास जाना चाहते थे। लेकिन भगवान शिव उनसे मिलना नहीं चाहते थे। इसलिए भगवान शिव गुप्तकाशी में छिप गए।गुप्त कशी में भगवन शिव नंदी बैल के रूप में पाण्डवों को दिखे। पहले पांडव उनको नहीं पहचान पाए लेकिन उंनका सुंन्दर और अद्भुत रूप देख के समझ गए की यही भगवन शिव हैं। भीम ने उन्हें पकड़ना चाहा लेकिन वो नहीं पकड़ पाए। भगवांन शिव जो की गुप्त कशी से अदृश्य हो चुके थे अब पांच अलग जगह पे प्रकट हुए। इस प्रकार पंच-केदार का जन्म हुआ। पांच केदार वो पांचो जगह का समूह हैं जहाँ वो प्रकट हुए थे।इन पांचो जगहों पे उनके शरीर का एक भाग प्रकट हुआ था। और वो पांच जगह हैं - केदारनाथ में पीठ, रुद्रनाथ में चेहरा, तुंगनाथ में भुजाएं, मध्यमहेश्वर में नाभि तथा कल्पेश्वर में जटा वाले बाल।
तुंगनाथ मंदिर जाने का रास्ता
कल्पेश्वर को छोड़कर अन्य केदारधाम अभी भी मोटर द्वारा नहीं जाया जा सकता, अन्य सभी केदारधामों में सिर्फ पैदल ट्रेकिंग द्वारा ही पंहुचा जा सकता है। यात्रा का आरम्भ अप्रैल के अंत से या मई की शुरुआत से लेकर अक्टूबर या नवंबर तक ही होता है। उसके बाद ये भूभाग बर्फ से ढक जाते हैं। भारी बर्फबारी के कारण शेष वर्ष मंदिर बंद हो जाते हैं।
ऋषिकेश से चोपता जाने के लिए बस और टैक्सी मिल जाते हैं। चोपता से तुंगनाथ मंदिर जाने के लिए पैदल यात्रा करना पड़ता है। चोपता से तुंगनाथ के बीच ट्रेकिंग की दूरी लगभग 3 से 4 किलोमीटर की है और पूरा करने के लिए आमतौर पर लगभग ढाई घंटे लगते हैं (ये आपके फिटनेस पर भी निर्भर करता है)।
आप जब चोपता से अपना पैदल यात्रा प्रारम्भ करते हैं तो रस्ते में आस पास के पहाड़ो पे घास मैदान देख़ने को मिलते हैं, दूर से देखने पे ऐसा लगता है की हरे मखमल की चादर बिछा दी गयी हो। उत्तराखंड में इसको बुगियाल कहते हैं। इसीलिए इसको मिनी स्वीट्ज़रलैंड भी कहते हैं। इसके चारो ओर हिमालय के पर्वत श्रृंख्ला हिम से ढके रहते हैं। यात्रा के दौरान आने वाले दृश्य इतने सुन्दर और सुहावने होते हैं कि आपको यात्रा की कठिनाई का पता ही नहीं चलता।
चंद्रशिला
चंद्रशिला तुंगनाथ का शिखर है। इसका शाब्दिक अर्थ है "moon rock"। यह समुद्र तल से लगभग 3,690 मीटर की ऊंचाई पर स्थित है। चंद्रशिला की चोटी से नंदादेवी, त्रिशूल, केदार शिखर और चौखम्बा की पर्वत चोटियों सहित हिमालय पर्वत श्रृंखला के दृश्य होते हैं। इस जगह के साथ विभिन्न किंवदंतियां जुड़ी हुई हैं। ऐसी मान्यता है कि चंद्र देव ने इस स्थान पर 84000 वर्ष भगवान रुद्र की उपासना की थी। इसलिए इसका नाम चंद्रशिला हुआ, ऐसा शास्त्रों में वर्णित है। मंदिर में दर्शन करने के बाद यात्री चंद्रशिला जाते हैं। यह मंदिर से ऊपर की ओर डेढ़ किलोमीटर दूर है जिसे आप प्राकृतिक सुंदरता का लुप्थ उठाते हुए आराम से पूरा कर सकते हैं।
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