भारत के प्रसिद्ध मंदिर

बद्रीनाथ मन्दिर, उत्तराखंड | Badrinath Temple, Uttarakhand

बद्रीनाथ अथवा बद्रीनारायण मन्दिर भारतीय राज्य उत्तराखण्ड के चमोली जनपद में अलकनन्दा नदी के तट पर स्थित एक हिन्दू मन्दिर है। यह हिंदू देवता विष्णु को समर्पित मंदिर है और यह स्थान इस धर्म में वर्णित सर्वाधिक पवित्र स्थानों में से एक है। यह विष्णु के 108 पवित्र स्थानों में से एक है। बद्रीनाथ मन्दिर में हिंदू धर्म के देवता विष्णु के एक रूप "बद्रीनारायण" की पूजा होती है। ऐसी मान्यता है कि इसे आदि शंकराचार्य ने 8वीं शताब्दी में पास के अलकनंदा नदी से विष्णु की मूर्ति निकालकर स्थापित किया था। यह मूर्ति स्वयं प्रकट हुई प्रतिमाओं में से एक माना जाता है। बद्रीनाथ को धाम छोटा चार धाम में से एक माना जाता है, छोटा चार धाम यमुनोत्री, गंगोत्री, केदारनाथ और बद्रीनाथ का समूह है। बद्रीनाथ मंदिर "पंच बद्री" तीर्थ के मंदिरों में से एक है, जो विष्णु की पूजा के लिए समर्पित हैं।

इस मन्दिर का उल्लेख विष्णु पुराण, महाभारत तथा स्कन्द पुराण जैसे कई प्राचीन ग्रन्थों में मिलता है। इसे बद्री-विशाल के नाम से भी जाना जाता है। ऐसा इसलिए है की ये निकटतम चार मंदिर जो की - आदि बद्री, वृद्धा बद्री, भाव्य बद्री और योगध्यान बद्री हैं के समूह को ब्यक्त करता है। इसे जोड़कर पूरे समूह को "पंच-बद्री" के रूप में जाना जाता है।

बद्रीनाथ से जुडी पौराणिक कथाएँ

बद्रीनाथ की पौराणिक कथाएँ भागवत पुराण, स्कंद पुराण और महाभारत जैसे ग्रंथो में बद्रीनाथ का उल्लेख मिलता है। भागवत पुराण के अनुसार, यहाँ बद्रीकाश्रम में स्वयं भगवान विष्णु ने नर और नारायण के रूप में मानव और समाज कल्याण के लिए यहाँ घोर तपस्या की थी। नर तथा नारायण ने धर्म के विस्तार हेतु कई वर्षों तक इस स्थान पर तपस्या की थी। अपना आश्रम स्थापित करने के लिए एक आदर्श स्थान की तलाश में वे वृद्ध बद्री, योग बद्री, ध्यान बद्री और भविष्य बद्री नामक चार स्थानों में घूमे। अंततः उन्हें अलकनंदा नदी के पीछे एक गर्म और एक ठंडा पानी का स्त्रोत मिला, जिसके पास के क्षेत्र को उन्होंने बद्री विशाल नाम दिया। यह भी माना जाता है कि व्यास जी ने महाभारत इसी जगह पर लिखी थी।

बहुनि सन्ति तीर्थानी दिव्य भूमि रसातले। बद्री सदृश्य तीर्थं न भूतो न भविष्यतिः।।

स्कन्द पुराण में बद्रीननाथ के बारे में यह लिखा गया है कि- स्वर्ग, पृथ्वी तथा नर्क तीनों ही जगह अनेकों तीर्थ स्थान हैं, परन्तु फिर भी बद्रीनाथ जैसा कोई तीर्थ न कभी था, और न ही कभी होगा।

अन्यत्र मरणामुक्ति: स्वधर्म विधिपूर्वकात। बदरीदर्शनादेव मुक्ति: पुंसाम करे स्थिता॥

महाभारत में बद्रीनाथ का उल्लेख करते हुए लिखा गया है - अन्य तीर्थों में तो स्वधर्म का विधिपूर्वक पालन करते हुए मृत्यु होने से ही मनुष्य की मुक्ति होती है, किन्तु बद्री विशाल के दर्शन मात्र से ही मुक्ति उसके हाथ में आ जाती है।

ब्रम्हाकपाल- एक अन्य मान्यता यह भी है कि, इसी स्थान पर पाण्डवों ने अपने पितरों का पिंडदान किया था। इसी कारण से बद्रीनाथ के ब्रम्हाकपाल क्षेत्र में आज भी तीर्थयात्री अपने पितरों का आत्मा का शांति के लिए पिंडदान करते हैं। स्कंद पुराण में कहा गया है कि स्वर्ग, पृथ्वी और नरक में कई पवित्र मंदिर हैं; लेकिन बद्रीनाथधाम जैसा कोई पवित्र मंदिर नहीं है।

बद्रीनाथ मंदिर का निर्माण

badrinath temple, बद्रीनाथ मन्दिर मंदिर ने बहुत हिमस्खलन झेले हैं, साथ हीं इसकी अपनी उम्र के कारण भी क्षति हुए तथा कई प्राकृतिक और अप्राकृतिक कारणों से कई बार इस मदिर का पुनर निर्माण हुआ। सन 1803 में भूकंप से प्रभावित इस मंदिर का जीर्णोद्धार जयपुर के राजा ने करवाया था। मंदिर का भवन बौद्ध मंदिर से मिलता-जुलता है। आद्य गुरु शंकराचार्य ने अलकनंदा नदी से बद्रीनाथ के मूर्ति को निकाल कर ताप्ती कुंड के गर्म झरनों के पास के एक गुफा में स्थापित किया था। बाद में 16 वीं शताब्दी के दौरान, गढ़वाल के राजा ने मूर्ति को वर्तमान मंदिर में स्थानांतरित कर दिया।

बद्रीनाथ मंदिर में पूजा, त्यौहार और उत्सव

यद्यपि, यह मन्दिर उत्तर भारत में स्थित है, किन्तु यहाँ के मुख्य पुजारी दक्षिण भारत के केरल राज्य के नम्बूदरी सम्प्रदाय के ब्राह्मण होते हैं। बद्रीनाथ मंदिर में आयोजित सबसे प्रमुख त्योहार माता मूर्ति का मेला है, जो पृथ्वी पर माँ गंगा नदी के आगमन की याद में मनाया जाता है। इस त्योहर में बद्रीनाथ की माँ, जो नदी को सामाजिक कल्याण के लिए बारह धाराओं में विभाजित करती है, की पूजा की जाती है। बद्री केदार उत्सव एक अन्य त्यौहार हैं जिसको जून के महीने के दौरान बद्रीनाथ मंदिर और केदारनाथ मंदिर दोनों में मनाया जाता है। यह त्योहार आठ दिनों तक चलता है। हिमालय क्षेत्र में मौसम की अति स्थिति होने के कारण यह हर साल छह महीने के लिए खुला रहता है (अप्रैल के अंत और नवंबर की शुरुआत के बीच) है। सर्दियों में तापमान जीरो डिग्री के निचे आ जाता है और बर्फ़बारी होती है।
तप्त कुंड, बद्रीनाथ श्रद्धालु मंदिर में प्रवेश करने से पहले तप्त कुंड में डुबकी लगते हैं। तप्त कुंड में पुरुषों और महिलाओं के स्नान करने की लिए अलग-अलग व्यवस्था है। तप्त कुंड अलकनंदा नदी और बद्रीनाथ के पवित्र मंदिर के बीच स्थित है। हैरान करने वाली बात ये है कि इस कुंड का पानी हमेशा गर्म रहता है। ऐसा मन जाता है कि इस कुंड में उच्च औषधीय गुड़ है। इस कुंड में स्नान करने के बाद आपकी थकान गायब हो जाती है और आप तरो ताज़ा अनुभव करते हैं।

बद्रीनाथ मंन्दिर तक कैसे पहुंचे?

बद्रीनाथ मंन्दिर तक जाने के लिए तीन ओर से रास्ता है। 1- रानीखेत से, 2- कोटद्वार होकर पौड़ी (गढ़वाल) से, 3- हरिद्वार होकर देवप्रयाग से। ये तीनों रास्ते कर्णप्रयाग में मिल जाते है। भारत के सुदूर क्षेत्र से आने वाले यात्री हरिद्वार होकर आते है।

बद्रीनाथ मंदिर के पास देखने की जगह

भीमपुल - यह एक सुन्दर प्राकृतिक झरना है, माना जाता है कि एक सुंदर झरने को स्वयं पांडव भीम ने बनाया था।

मुचकुन्द गुफा - इसी गुफा में भगवान कृष्ण और मुचुकुंद नाम का एक दानव के बीच लड़ाई हुई थी। गुफा में भगवान कृष्ण के पैर के निशान भी हैं।

व्यास गुफा - यह महर्षि वेद व्यास की प्रसिद्ध गुफ़ा। है। यह वही स्थान था जहाँ महर्षि वेद व्यास ने भगवान गणेश को सम्पूर्ण महाभारत को सुनाया।

गणेशा गुफा - मन जाता है कि महर्षि वेद व्यास ने यहीं महाभारत लिखी थी।

वसुधारा - महाभारत के बाद, पांडवों ने मोक्ष पाने की कोशिश की। वसुधारा वह स्थान था जहाँ द्रौपदी की मृत्यु हुई और युधिष्ठिर ने उनका यहीं पे अंतिम संस्कार किया और फिर उसकी समादि स्थल पर धर्मशीला नामक एक बड़ा पत्थर रख दिया। वसुधारा का पानी इसी धर्मशिला पर गिरता है।

माडा गांव - यह भारतीय क्षेत्र का अंतिम गाँव है और इसके बाद चीन की सीमा आरम्भ हो जाती है। यह बद्रीनाथ से सिर्फ 3 किलोमीटर दूर है। माडा गांव के ग्रामीणों को श्री बदरीनाथ मंदिर की गतिविधियों के साथ निकटता से जोड़ा जाता है क्योंकि वे मंदिर के समापन के दिन देवता को चोली चढ़ाते हैं - यह एक वार्षिक परंपरा है। माडा गाँव गुफाओं से भरा हुआ है और ऐसा कहा जाता है कि वेद व्यास ने गणेश को महाभारत यहीं पर सुननया था, जिसे अब व्यास गुफ़ा के नाम से जाना जाता है।

बद्रीनाथ मंदिर जाने का सही समय

बद्रीनाथ का मंदिर भी साल छह महीने ही दर्शन के लिए खुला रहता है। हिमालय की पहाड़ियों के बीच होने की वजह से बहुत बर्फ़बारी होती है। इसलिए गर्मी के मौसम में मई महीने से लेकर नवंबर तक ही ये मंदिर खुला रहता है, इसके बाद इसके कपाट बंद कर दिए जाते हैं। केदार नाथ जाने का सही समय मई से नवंबर तक है , लेकिन बीच में मानसून के समय वहां जाने से बचे। मानसून में बारिश होने के कारण वहां हिम स्खलन होता है।

बद्रीनाथ धाम के कपाट बंद होने की तिथी बद्रीनाथ-केदारनाथ समिति द्वारा विजयदशमी के दिन तय की जाती है। चारो धामों के कपाट शुभ मुहूर्त पर वैदिक मन्त्रों के जाप के साथ बंद कर दिया जाते है। बद्रीनाथधाम का मंदिर के खुलने की तिथि बसंत पंचमी को तय होती है।

बद्रीनाथ मंदिर के पास रुकने की जगह

वैसे तो बद्रीनाथ में होटल्स है जिसे आप ऑनलाइन बुक कर सकते हैं या वहां पहुंचकर बुक कर सकते हैं। बद्रीनाथ से 40 किलोमीटर दूर जोशीमठ शहर है। जोशीमठ में बहुत सरे लॉज और होटल्स मिल जायेंगे, आप यहां भी रुक सकते हैं।

बद्रीनाथ मंदिर के यात्रा का कार्यक्रम- itinerary

उत्तराखण्ड को देव भूमि भी कहा जाता है। उत्तराखण्ड से भारत की बहुत सी पवित्र नदियां निकलती है जिसमे गंगा सबेस पवित्र मानी जाती है। इसके अलावा इसी राज्य में पंच बद्री , छोटा चार धाम, हरिद्वार, ऋषिकेश, केदारनाथ धाम तथा पंच-केदार आदि तीर्थ स्थान हैं । यहाँ का यात्रा एक बहुत बृहद यात्रा हो सकता है। अगर आप भारत के दूर स्थान से आ रहे हैं तो कोशिश करें कि हरद्वार, ऋषिकेश , और केदारनाथ को अपने यात्रा में जरूर शामिल करें। इसके अलावा अगर आपके पास समय है तो आप अन्य महत्वपूर्ण तीर्थ घूमने का प्लान कर ले।

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