भारत के प्रसिद्ध मंदिर

काशी विश्वनाथ मंदिर जो बसा है दुनिया के पुरानतम शहर काशी में | Kashi Vishwanath Temple

शिव मंदिरों के पवित्रतम ज्योतिर्लिंगों में से एक है काशी विश्वनाथ का मंदिर, जो भारत के उत्तर प्रदेश राज्य के वाराणसी शहर के विश्वनाथ गली में स्थित है। भगवान शिव को समर्पित यह सबसे प्रसिद्ध हिंदू मंदिरों में से एक है। काशी विश्वनाथ का मंदिर पवित्र गंगा नदी के पश्चिमी तट पर स्थित है। यहाँ भगवन शिव को श्री विश्वनाथ और विश्वेश्वर नामों से जाना जाता है। अगर इसका संधि विछेद करें तो ये हो जाता है - विश्व + नाथ = विश्वनाथ या विश्व + ईश्वर = विश्वेश्वर, जिसका शाब्दिक अर्थ है ब्रह्मांड का भगवान। प्राचीन काल में वाराणसी शहर को कुशी कहा जाता था जो समय के साथ बदल कर काशी हो गया, और इसलिए मंदिर को काशी विश्वनाथ मंदिर कहा जाता है। काशी विश्‍वनाथ मंदिर का हिंदू धर्म में एक विशिष्‍ट स्‍थान है। ऐसा माना जाता है कि एक बार इस मंदिर के दर्शन करने और पवित्र गंगा में स्‍नान कर लेने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।

काशी विश्वनाथ मंदिर का निर्माण किसने करवाया

वर्तमान में जो मंदिर है उसका निर्माण 1780 में इंदौर के मराठा शासक अहिल्या बाई होल्कर ने करवाया जो अपने मूल स्थान के निकट है। बाद में महाराजा रणजीत सिंह ने इसके शिखर पर सोने के पत्तर चढ़वा दिए थे। इस मंदिर को कई बार नष्ट किया गया और इसका कई बार पुनर निर्माण हुआ। पूर्व में जो मंदिर था उसको औरंगज़ेब ने 1669 ईस्वी में ध्वस्त करके उसी जगह पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया था। मंदिर के मूल स्थान पे आज भी मस्जिद मौजूद है। मस्जिद के पिछले भाग में पुराने मंदिर के अवशेष आज भी मौजूद हैं। इसको लेकर हिन्दू और मुस्लिम समाज में विवाद भी है।

काशी विश्वनाथ ने झेले कई आक्रमण

मूल विश्वनाथ मंदिर को 1194 ईस्वी में मोहम्मद गोरी के सेनापति ऐबक ने कन्नौज के राजा को हराकर नष्ट कर दिया था। बाद में मंदिर का पुनर्निर्माण एक गुजराती व्यापारी ने दिल्ली के सुल्तान इल्तुतमिश के शासनकाल के दौरान करवाया। इस मंदिर को सिकंदर लोधी के शासन काल (1489-1517) के दौरान फिर से ध्वस्त कर दिया गया था, जिसको राजा मान सिंह ने मुगल सम्राट अकबर के शासन के दौरान फिर से पुनर निर्माण करवाया। राजा टोडर मल ने 1585 में अपने मूल स्थान पर मंदिर का फिर से निर्माण किया। 1669 ईस्वी में औरंगज़ेब ने मंन्दिर को फिर से ध्वस्त करके उसी जगह पर ज्ञानवापी मस्जिद का निर्माण करवाया जो आज भी मौजूद है और उसके पिछले भाग में आज भी मंन्दिर के अवशेष हैं। इसके बाद इंदौर की शासक अहिल्या बाई होल्कर ने इसका पुनर निर्माण मस्जिद से सटे हुए करवाया।

काशी का इतिहास

काशी का उल्लेख प्राचीन काल के ग्रंथो, पुराणों, उपननिषदो और वेदो में भी मिलता है। साथ ही पाणिनि, पंतञ्जलि आदि ग्रन्थों में भी काशी की चर्चा है। काशी का सर्वप्रथम उल्लेख हमें अर्थर्ववेद की पैप्पलादसंहिता में मिलता है। महाभारत में काशी के अनेक उल्लेख हैं। महाभारत में वर्णित एक कथा के अनुसार पितामह भीष्म ने काशी नरेश की तीन पुत्रियों अंबा, अंबिका और अंबालिका का अपहरण किया था। इस अपहरण के परिणामस्वरूप काशी और हस्तिनापुर की शत्रुता हो गई। इसी कारण महाभारत के युद्ध में काशिराज ने पांडवों का साथ दिया था। पुराणों मे स्पष्ट है कि काशी क्षेत्र में पग-पग पर तीर्थ है।

काशी (बनारस) के प्रमुख घाट एवं मंदिर

काशी में गंगा नदी के किनारे बहुत से घाट हैं। घाटों की कुल संख्या लगभग 88 है । लेकिन प्रसिद्ध घाटों में दशाश्वमेध घाट, मणिकार्णिंका घाट, अस्सि घाट (गंगा और अस्सी नदी का संगम), ललिता घाट, राज घाट, हरिश्चंद्र और तुलसीघाट की गिनती की जा सकती है।

काशी के प्रमुख घाट
दशाश्वमेध घाट

दशाश्वमेध घाट दशाश्वमेध घाट प्रमुख घाटों में से एक है। इसके साथ दो हिंदू पौराणिक कथाएं जुड़ी हुई हैं: एक के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने भगवान शिव का स्वागत करने के लिए इसे बनाया था। एक अन्य के अनुसार, भगवान ब्रह्मा ने यहाँ दश-अश्वमेध यज्ञ किया गया था। दशाश्वमेध घाट पे शाम को गंगा माँ की आरती होती है, जिसको देखने के लिए न सिर्फ भारतीय लेकिन अनेको देशो के विदेशी नागरिक भी बड़े उत्साह से देखते हैं। आप गंगा नदी के अंदर नाव पे सवार होकर भी देख इस दृश्य को देख सकते हैं। यह दृश्य बहुत ही मनमोहक होता है।

मणिकार्णिंका घाट

मणिकार्णिंका घाट, काशी इस घाट को मुक्ति का घाट भी कहते है। इस घाट पर चिता की अग्नि लगातार जलती ही रहती है, और कभी भी बुझने नहीं पाती 24 घंटे ऐसा ही चलता है। और ये चिता की आग हज़ारो सालों से कभी बुझी नहीं है, क्योकि ये लगातार जलती रहती है जो आदि काल से चलती आ रही है और अनंत काल तक चलती रहेगी। वैसे तो लोग श्मसान घाट में जाना नही चाहते, पर यहाँ देश विदेश से लोग इस घाट का दर्शन भी करने आते है जिससे उनको एहसास होता है कि जीवन का अंतिम सत्य यही है।

विश्वनाथ मंदिर से दो मील की दूरी पर भैरोनाथ का मंदिर है, उन्हें काशी का कोतवाल कहा जाता है। उनके हाथ में बड़ी एवं मोटे पत्थर की लाठी होने के कारण इन्हें दण्डपाणि भी कहा जाता है। इसका वाहन कुत्ता है। संकटमोचन मंदिर की स्थापना गोस्वामी तुलसीदास ने की थी। दुर्गा के मंदिर को 17 वीं शताब्दी में मराठों ने बनवाया था।

काशी की महत्ता। काशी क्यों महत्वपूर्ण है ?

जब लोग एक निश्चित वृद्ध अवस्था में पहुंच जाते हैं, तो वे काशी की यात्रा करते हैं, और वहाँ मरने की प्रतीक्षा करते हैं। ऐसी मान्यता है कि काशी-क्षेत्र में देहान्त होने पर जीव को मोक्ष की प्राप्ति होती है, काश्यांमरणान्मुक्ति:। जहां देह त्यागने मात्र से प्राणी मुक्त हो जाय, वह अविमुक्त क्षेत्र यही है। गंगा नदी के किनारे मणिकर्णिका घाट पर सामूहिक दाह संस्कार होता है। यह दृश्य अब भी, आपको इस घाट पर देखने को मिल जायेगा। वहां एक दर्जन शव जल रहे होंगे और एक दर्जन शव कतार में इंतजार कर रहे होंगे। मतस्यपुराण का मत है कि जप, ध्यान और ज्ञान से रहित मनुष्यों के लिये काशीपुरी ही एकमात्र गति है।

काशी को भारत की सांस्कृतिक राजधानी होने का गौरव भी प्राप्त है। इसने भारत की सांस्कृतिक एकता तथा संरक्षण में भारी योग दिया है। कहा जाता है कि यह पुरी भगवान शंकर के त्रिशूल पर बसी है। अत: प्रलय होने पर भी इसका नाश नहीं होता है।

काशी- धर्म और विद्या का केंद्र

काशी प्राचीन काल से ही धर्म और विद्या का केंद्र रहा है। जिज्ञासु इस धरती पर दूर दूर से ज्ञान प्राप्त करने के लिए आते रहे हैं। काशी के पास सारनाथ में ही बुद्धा ने अपनी पहले धर्म की शिक्षा दी थी। काशी में प्राचीन परंपरा की अनेको संस्कृत पाठशालाएँ हैं। आज भी यहां वेदो का पाठ पढ़ाया जाता है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय (BHU - बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी) जिसकी स्थापना पंडित मदन मोहन मालवीय ने 1916 में की थी आज भारत के उत्क्रिस्ट विश्वविद्यालयों में से एक है। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के परिसर में स्थित एक प्रसिद्ध शिव मन्दिर है। इसे 'नया विश्वनाथ मन्दिर' या 'बिड़ला मन्दिर' भी कहा जाता है।

भारत के कई कवि, लेखक, दार्शनिक और संगीतज्ञ वाराणसी में रहे हैं, जिनमें कबीर, वल्लभाचार्य, रविदास, स्वामी रामानंद, मुंशी प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद, आचार्य रामचंद्र शुक्ल, पंडित रवि शंकर, गिरिजा देवी, पंडित हरि प्रसाद चौरसिया एवं उस्ताद बिस्मिल्लाह खां आदि कुछ हैं। गोस्वामी तुलसीदास ने हिन्दू धर्म का परम-पूज्य ग्रंथ रामचरितमानस यहीं लिखा था और गौतम बुद्ध ने अपना प्रथम प्रवचन यहीं निकट ही सारनाथ में दिया था।

काशी- बनारस के प्रसिद्ध व्यंजन

काशी सिर्फ धर्म, मोक्ष और विद्या का ही केंद्र नहीं है, बनारस के तंग गलियों की दुकानों के अलग अलग पकवान और ब्यंजन बहुत प्रसिद्ध हैं। अगर आप बनारस जे रहे हैं तो यहां के बिभिन्न ब्यंजनो को स्वाद जरूर लें।

बनारस के प्रसिद्ध व्यंजन
  • कचोरी सब्जी और जलेबी
  • टमाटर चाट
  • बनारसी ठंडाई और भिन्न्न प्रकार के लस्सी
  • बनारसी दूध, रबड़ी और मलाई
  • छेना दही वड़ा
  • बाटी चोखा / लिट्टी चोखा
  • चूड़ा मटर
  • बनारस की कलाकंद मिठाई
  • बनारसी पान

काशी - बनारस के प्रमुख पूजा, त्योहार और स्नान

महाशिवरात्रि - काशी भगवन शिव की नगरी है। यहाँ महाशिवरात्रि बड़े धूम धाम से मनाया जाता है। महाशिवरात्रि के दिन भगवन शिव के दर्शन और जल और दुग्ध अभिषेक के लिए बहकर दूर दूर से आते हैं। यहां रात्रि के चौथे पहर से ही लाइन लग जाती है। इस दिन काशी में भगवन शिव की बरात भी निकलती है।

मकर संक्रांति - मकर संक्रांति के पर्व पर काशी में भोर से ही गंगा घाट पर स्नान करने वाले और बाबा के दरबार में दर्शन पूजन करने वालों की भीड़ लगी रही।

पितृपक्ष और पिंड दान - पितृपक्ष के समय काशी में लोग पूर्वजों के पिंड दान के आते हैं।गंगा के घाट पर गंगा स्नान करके पित्रों का तर्पण किया जाता है और पिंडदान की पूजा की जाती है।

काशी की देव दीपावली - कार्तिक पूर्णिमा के दिन वाराणसी में देव दीपावली पर्व मनाया जाता है। इस दिन पुरे घाट को दिए से सजाया जाता है। दिए से जगमगाता घाट का दृश्य देखने लायक होता है। यह पांच दिवसीय त्यौहार प्रबोधिनी एकादशी (कार्तिक के 11 वें दिन) से शुरू होकर कार्तिक पूर्णिमा को संपन्न होता है।

बनारस के प्रमुख पूजा, त्योहार और स्नान

सावन का महीना - इस माह में कावंड यात्रा होती है जिसमे भक्त जन केसरिया वस्त्र धारण कर दूर दूर से आते हैं और कावंड में जल भर के काशी विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव के ज्योतिर्लिंग पर जलाभिशेख करते हैं|

काशी - वाराणसी तक कैसे पहुंचे ?

वाराणसी पूर्वी उत्तर प्रदेश में है। यहाँ पहुंचना बहुत ही आसान है। यहाँ अंतर राष्ट्रीय हवाई अड्डा है और रेलवे जंक्शन भी है दो देश के सभी शहरों को अच्छे से कनेक्ट करता है। आप हवाई यात्रा करना चाहते है या ट्रैन से यात्रा करना चाहते है , दोनो ही विकप अच्छे हैं।

वाराणसी में रुकने का स्थान - काशी में होटल, होमस्टे, धर्मशाला

भारत का प्रमुख तीर्थ स्थल होने की वजह से यहाँ होटल , धर्मशाला , गेस्ट हाउस और लॉज की कमी नहीं है। आपको वहां रुकने के लिए बहुत से बिकल्प मिल जायेंगे। आप चाहे तो इंनटरनट से ऑनलाइन भी इसक बुकिंग कर सकते हैं।

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